ये मिसरा' लिख दिया ज़ालिम ने मेरी लौह-ए-तुर्बत परजो हो फ़ुर्क़त की बेताबी तो यूँ ख़्वाब-ए-गिराँ क्यूँ हो
Ye misra' likh diya zalim ne meri lauh-e-turbat parJo ho furqat ki betabi to yun khwab-e-giran kyun ho